अभिभावक संघ के प्रतिनिधियों को प्रबंध समिति में पदेन सदस्य के रूप में सम्मिलित किया जाए।
(उज्ज्वल राणा, डी.ए.वी. कॉलेज, बुढ़ाना की दुखद घटना के परिप्रेक्ष्य में)
डी.ए.वी. पी.जी. कॉलेज, बुढ़ाना के छात्र उज्ज्वल राणा की असमय मृत्यु ने सम्पूर्ण समाज को झकझोर दिया है। यह केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि हमारी उच्च शिक्षा व्यवस्था, उसके प्रबंधन और उत्तरदायित्व प्रणाली की गहरी खामियों का आईना है।
विद्यालय और महाविद्यालय केवल शैक्षणिक संस्थान नहीं, बल्कि संवेदनशील सामाजिक इकाइयाँ हैं,
जिनमें छात्र, शिक्षक और अभिभावक तीनों की सक्रिय भागीदारी से ही शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य पूरा होता है। किंतु वर्तमान में अधिकांश संस्थानों में अभिभावक संघों का अभाव है, जिससे पारदर्शिता, संवाद और जवाबदेही की कड़ी टूट जाती है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने शिक्षा के बहु-हितधारक दृष्टिकोण को अपनाने की अनुशंसा की है, जिसमें अभिभावक, छात्र और समाज की भागीदारी को आवश्यक बताया गया है।
इसी प्रकार, राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग और राज्य शिक्षा नियमावली के अंतर्गत भी स्कूल प्रबंधन समितियों में अभिभावक प्रतिनिधित्व का प्रावधान किया गया है।
तथापि, महाविद्यालय स्तर पर यह सहभागिता अभी तक प्रभावी रूप में लागू नहीं की गई है।
इसलिए आवश्यक है कि-
👉प्रत्येक विद्यालय और महाविद्यालय में अभिभावक संघ का गठन विधिक रूप से अनिवार्य किया जाए।
👉प्रबंध समिति में अभिभावक संघ के प्रतिनिधियों को पदेन सदस्य के रूप में शामिल किया जाए।
👉छात्र कल्याण से संबंधित निर्णयों में अभिभावकों की सहमति एवं दृष्टिकोण को वरीयता दी जाए।
👉संस्थानिक उत्तरदायित्व को सुनिश्चित करने हेतु राज्य विश्वविद्यालय अधिनियमों में संशोधन कर इस प्रावधान को विधिक रूप से सशक्त किया जाए।
यदि यह व्यवस्था लागू होती है, तो उज्ज्वल राणा जैसे मामलों में प्रबंधन की निष्क्रियता या उदासीनता को पहले ही रोका जा सकता है।
शिक्षा केवल पुस्तकों तक सीमित न रहकर मानव संवेदना और पारदर्शिता का माध्यम बन सकेगी।
यह समय है कि समाज और सरकार मिलकर यह सुनिश्चित करें कि प्रत्येक शिक्षण संस्थान में अभिभावकों की आवाज़ सुनी जाए और उनके प्रतिनिधित्व को संविधानिक मान्यता दी जाए।
-डॉ.सन्दीप कुमार शर्मा
विधि विशेषज्ञ एवं पूर्व सहायक प्रोफेसर विधि
बडौत (बागपत)






